ग्राम चुरली स्थित प्राथमिक शाला, जिसमें पहली से पांचवीं तक की कक्षाएँ संचालित होती हैं, 38 मासूम बच्चों का भविष्य थामे खड़ी है — वो भी उस इमारत में, जिसकी छत की लोहे की सड़ती सलाईयाँ किसी दुर्घटना की पूर्वसूचना जैसी प्रतीत होती हैं। अभिभावकों की विवशता देखिए, बच्चों को सुरक्षित स्थान दिलाने के लिए उन्होंने स्थानीय शीतला मंदिर और पंचायत भवन के एक छोटे से कक्ष का सहारा लिया।
10 वर्षों की उपेक्षा और अब 'भगवान भरोसे' शिक्षा
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि विद्यालय में पदस्थ शिक्षक राजकुमार मड़ामे पिछले एक दशक से वहां कार्यरत हैं, लेकिन आज तक उन्होंने भवन की मरम्मत की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया। हर बार, शासन से आई मरम्मत राशि का उपयोग या तो अधूरा रहा या फिर ‘अदृश्य’ हो गया। शिकायतों पर वही पुरानी घिसीपिटी प्रतिक्रिया — “सरकारी काम है, समय लगता है।”
बारिश के मौसम में हालात और बदतर हो जाते हैं। स्कूल की दीवारें पानी रिसने से नम हैं, और करंट तक फैलने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। छत में तिरपाल तो जरूर डाली गई है, लेकिन यह प्रयास पंचायत की ओर से हुआ — शिक्षा विभाग अब तक मौन है।
तोड़ते भरोसे को नमी देती बारिश
शिक्षा, जो बच्चों की नींव होनी चाहिए, वह यहां सीलन भरी दीवारों और खतरनाक छतों के नीचे सिसक रही है। भवन की जर्जर स्थिति का आलम ये है कि अब तीन दिन से बच्चों को मंदिर परिसर और पंचायत भवन में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। 38 बच्चों को एक ही कक्ष में ठूंसकर पढ़ाना एक असहनीय दृश्य बन गया है।
शिक्षा का अधिकार बनाम फंड की बेबसी
लांजी विकासखंड के बीआरसी ने इस पूरी स्थिति पर शिक्षक का पक्ष लेते हुए बताया कि पिछले दो वर्षों से शासन द्वारा पर्याप्त धनराशि नहीं दी गई है। जो भी फंड आता है, वह अन्य खर्चों में ही गुम हो जाता है। “ऊँट के मुंह में जीरा” वाली स्थिति है — न मरम्मत होती है, न स्थायी समाधान मिलता है।
क्या किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा सिस्टम?
इस तरह की खबरें केवल चुरली तक सीमित नहीं हैं। लांजी विकासखंड के अन्य कई गांवों में भी विद्यालय भवन अपनी अंतिम सांसे गिन रहे हैं। प्रश्न उठता है कि जब बच्चों को जान जोखिम में डालकर शिक्षा लेनी पड़ रही है, तो शिक्षा का अधिकार किस मापदंड पर खरा उतर रहा है?
क्या शासन-प्रशासन किसी हादसे की प्रतीक्षा में है, ताकि फिर एक बार “घटना के बाद हरकत में आया प्रशासन” की हेडलाइन बन सके?
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