भोपाल। “सबके लिए स्वास्थ्य, सभी नीतियों में स्वास्थ्य” — इसी मूल विचार के साथ भोपाल में जन स्वास्थ्य अभियान-इंडिया की तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन हुआ, जिसमें 11 राज्यों से आए 53 से अधिक प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, ग्रासरूट वर्करों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों ने भाग लिया।
स्वास्थ्य नीति में आमूलचूल बदलाव की ज़रूरत
प्रतिभागियों ने एक सुर में कहा कि वर्तमान में देश की स्वास्थ्य नीतियां जनविरोधी और कॉर्पोरेट-परस्त होती जा रही हैं। इन नीतियों से गरीब, श्रमिक, ग्रामीण और वंचित वर्ग की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। कार्यशाला में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि:
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स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण और आउटसोर्सिंग तत्काल रोकी जाए।
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आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं पर मूल्य नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए।
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स्वास्थ्य के सामाजिक कारकों — जैसे स्वच्छ हवा, पानी, पोषण — को नीतियों के केंद्र में लाया जाए।
कोविड अनुभवों से सबक नहीं लिया सरकार ने
कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की भारी कमजोरी और निजी क्षेत्र की मुनाफाखोरी को भी कार्यशाला में बार-बार रेखांकित किया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि PPP मॉडल के माध्यम से स्वास्थ्य को बाज़ार के हवाले किया जा रहा है, जो खतरनाक है।
महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित
कार्यशाला के अंत में कुछ ठोस प्रस्ताव भी पारित किए गए, जिनमें प्रमुख हैं:
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सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को मज़बूत और जवाबदेह बनाया जाए।
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स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में पर्याप्त वृद्धि हो।
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हाशिये के समुदायों को प्राथमिकता दी जाए।
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श्रमिकों के स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा हो।
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हर क्षेत्र की नीति में स्वास्थ्य का एक समावेशी दृष्टिकोण हो।
जन स्वास्थ्य सम्मेलन की घोषणा
इस कार्यशाला में यह भी तय किया गया कि वर्ष के अंत में जन स्वास्थ्य अभियान-इंडिया का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होगा। इसके पहले 10 राज्यों में क्षेत्रीय सम्मेलन और कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी ताकि जमीनी स्तर की आवाज़ें राष्ट्रीय मंच पर पहुंच सकें।
प्रख्यात विशेषज्ञों की सहभागिता
इस कार्यशाला में प्रो. रितु प्रिया, डॉ. वंदना प्रसाद, डॉ. अनुराग भार्गव, डॉ. संजय नागरल, डॉ. वीना शत्रुघन, राकेश दीवान, रेमा नागराजन, इनायत, मुकुट लोचन, वी पी सूर्यवंशी, अमूल्य निधि, एस. आर. आजाद, राही रियाज़, प्रशांत सहित कई अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विचार रखे।
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