दो दशक बाद लॉटरी की वापसी
हिमाचल प्रदेश में 1999 से सभी प्रकार की लॉटरी पर प्रतिबंध था, हालांकि ऑनलाइन लॉटरी की बिक्री पर कोई रोक नहीं थी, क्योंकि 1998 के कानून में इसका जिक्र नहीं था। अब सरकार ने निविदा प्रक्रिया के माध्यम से लॉटरी संचालन को पुनर्जनन देने का निर्णय लिया है। उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने बताया कि पंजाब और केरल जैसे राज्यों की तर्ज पर लॉटरी का संचालन किया जाएगा, जिससे सरकारी खजाने को मजबूती मिलेगी।
आर्थिक संकट से जूझ रहे हिमाचल के लिए राहत
राज्य सरकार पर वर्तमान में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। ऐसे में, लॉटरी से होने वाली आय सरकार के लिए वित्तीय संकट से उबरने का एक महत्वपूर्ण साधन हो सकती है। वित्त विभाग की प्रस्तुति के अनुसार, केरल ने लॉटरी से एक वर्ष में 13,582 करोड़ रुपये, पंजाब ने 235 करोड़ रुपये, और सिक्किम जैसे छोटे राज्य ने 30 करोड़ रुपये की कमाई की है। हिमाचल सरकार को उम्मीद है कि लॉटरी संचालन से न केवल राजस्व बढ़ेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
संसाधन संग्रहण समिति की सिफारिश
यह फैसला उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता वाली संसाधन संग्रहण समिति की सिफारिश पर आधारित है। समिति ने वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए लॉटरी को एक प्रभावी उपाय माना। वित्त विभाग ने मंत्रिमंडल को बताया कि केरल, गोवा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, सिक्किम, नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्य लॉटरी से भारी राजस्व कमा रहे हैं।
अन्य क्षेत्रों से भी राजस्व बढ़ाने की कोशिश
लॉटरी के अलावा, सरकार खनन, पर्यटन, और जलविद्युत जैसे क्षेत्रों से भी अतिरिक्त राजस्व जुटाने पर ध्यान दे रही है। हाल ही में कांगड़ा और बिलासपुर में खदानों की नीलामी से 18.82 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद है। साथ ही, पर्यटन क्षेत्र, जो राज्य की अर्थव्यवस्था का 7% हिस्सा है, भी राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है।
पारदर्शी संचालन पर जोर
सरकार ने स्पष्ट किया कि लॉटरी का संचालन पूरी तरह से पारदर्शी और नियमानुसार होगा। निविदा प्रक्रिया के माध्यम से संचालकों का चयन किया जाएगा, और पंजाब व केरल मॉडल की तरह इसे प्रभावी बनाया जाएगा। यह कदम न केवल आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा, बल्कि हिमाचल को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण योगदान देगा।
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