नई दिल्ली, 26 जुलाई 2025।
सरकारी याचना में कहा गया है कि 2018 में पारित शीर्ष अदालत के फैसले की पुनर्समीक्षा आवश्यक है, क्योंकि यह प्रतिबंध उन वाहनों पर भी लागू है जो प्रदूषण नियंत्रण मापदंडों का विधिवत पालन कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में वाहनधारकों को अनुचित दिक्कतों से दो-चार होना पड़ रहा है।
यह अपील ‘एम सी मेहता बनाम भारत सरकार’ मामले के अंतर्गत दाख़िल की गई है, जिसमें सरकार ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि अब भारत स्टेज-6 (BS-VI) उत्सर्जन मानकों को व्यापक रूप से लागू किया जा चुका है, और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण-पत्र (PUC) प्रणाली को भी अधिक अनिवार्य रूप में लागू किया जा रहा है।
सरकार ने यह भी इंगित किया है कि सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के निर्णय की अनुपालना करते हुए वर्ष 2020 में बीएस-छह मानकों को अनिवार्य बना दिया गया, जो तकनीकी रूप से अत्यंत न्यून प्रदूषण उत्सर्जित करते हैं। ऐसे में यदि न्यायालय का 29 अक्टूबर 2018 का आदेश यथावत रहा, तो कई प्रदूषण-मुक्त आधुनिक वाहनों को भी बिना किसी वैज्ञानिक आधार के कुछ वर्षों में सड़क से हटाना पड़ेगा – जो आम नागरिकों के लिए घोर असुविधाजनक होगा।
सरकारी पक्ष ने यह भी तर्क दिया है कि प्रदूषण निवारण हेतु अनेक वैकल्पिक उपाय भी अपनाए गए हैं, जिनमें इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करना प्रमुख है। पर्यावरणीय चेतना को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं ताकि सतत विकास और जनसुविधा के बीच संतुलन कायम किया जा सके।
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