घमंडी चौक: जबलपुर की विरासत में बसा एक नाम, एक किस्सा, एक शख्सियत ✍️ लेखक: पंकज स्वामी

घमंडी चौक: जबलपुर की विरासत में बसा एक नाम, एक किस्सा, एक शख्सियत

जबलपुर शहर में जहां एक ओर आधुनिकता के साथ नए नामों और इमारतों का निर्माण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ नाम ऐसे भी हैं जो इतिहास, संस्कृति और दिलचस्प दंतकथाओं के सहारे अपनी पहचान बनाए हुए हैं। ऐसा ही एक नाम है — “घमंडी चौक”

यह नाम जितना अनोखा लगता है, उतनी ही दिलचस्प इसकी पृष्ठभूमि भी है। लार्डगंज थाना और बड़ा फुहारा मार्ग के बीच स्थित यह चौक अपने नाम की वजह से हर आगंतुक को हैरानी में डाल देता है — आखिर कोई चौक “घमंडी” कैसे हो सकता है?

✍️ लेखक: पंकज स्वामी


🔥 जहाँ शहादत ने इतिहास रचा

14 अगस्त 1942 को इसी स्थान पर गुलाब सिंह, मात्र 16 वर्ष की उम्र में आजादी की लड़ाई में शहीद हो गए थे। उस समय इस जगह को “घमंडी चौक” के नाम से नहीं जाना जाता था, परंतु आज़ादी के मतवालों की यह धरती कालांतर में एक और अनूठे नाम से इतिहास में दर्ज हो गई।


🍽️ जहां बैठकों में मंगोड़े की खुशबू थी

देश के वरिष्ठ राजनेता शरद यादव जब जबलपुर आते तो देवा मंगोड़े वाले के यहाँ जरूर मंगोड़े खाते। इसी चौक के आसपास की गलियों में वे बैठकी करते, राजनीति की चर्चाएं होतीं और गर्मागर्म मंगोड़े उनके स्वाद को और यादगार बना देते।


🤼 एक पहलवान जिसने नाम दिया चौक को

इस चौक का नाम घनश्याम दास चौबे के नाम पर पड़ा, जिन्हें लोग प्यार से (या कहें मज़ाक में) "घमंडी महाराज" कहने लगे।
1918 के आसपास झिरिया गाँव से विस्थापित होकर जब चौबे परिवार जबलपुर आया, तो दीक्षितपुरा में बस गया। पांच भाइयों को पहलवानी का शौक था और घनश्याम दास उनमें खास थे — जीवन भर अविवाहित, हमेशा जल्दी में रहने वाले, और खाने के वक्त उंगलियों से तबला बजाने वाले!

घर में दादी उन्हें चिढ़ाते हुए "घमंडी" कहती थीं, और यहीं से नाम पड़ गया घमंडी महाराज


🏨 होटल से चौक तक का सफर

बड़ा फुहारा के पास सूर्य विजय होटल खोलने के बाद घनश्याम दास पूरी तरह घमंडी महाराज के नाम से पहचाने जाने लगे। और धीरे-धीरे वह स्थान भी इसी नाम से जुड़ गया — घमंडी चौक

चौबे परिवार के बच्चे उन्हें “घम्मी कक्का” कहकर पुकारते थे।
उनका घर महाकौशल स्कूल के पीछे था, जिसमें किरायेदार भी रहते थे।


💞 बद्री – एक अनाथ बालक की कहानी

एक बार मुंबई से लौटते हुए घमंडी महाराज एक अनाथ बच्चे को अपने साथ ले आए, जिसका नाम उन्होंने बद्री रखा। बद्री अद्भुत नर्तक था और बच्चों के लिए “सुकू सुकू” पर नाचकर महफिल लूट लेता था। लेकिन चौबे परिवार की दादी कभी उसे "बद्री" नहीं कह पाईं, क्योंकि उनके पति का नाम भी बद्री प्रसाद था।


⚰️ 1961: एक युग का अंत

अस्थमा के कारण 1961 में घमंडी महाराज का निधन हो गया। उनकी संपत्ति चेतराम चौबे (बड़े भाई) को विरासत में मिली, जिसमें एक पुरानी एजेएस मोटर साइकिल भी थी — जिसकी पेट्रोल टंकी पर गियर लगा होता था।

रामेश्वर चौबे

आज चौबे परिवार के रामेश्वर चौबे सुपर मार्केट के काफी हाउस में दिन बिताते हैं। मूंछें, दाढ़ी और एकांत प्रिय जीवनशैली उन्हें किसी पुरानी फ़िल्म के किरदार जैसा बना देती है।


📸 एक तस्वीर जो नहीं मिल सकी...

घमंडी महाराज की तस्वीर आज तक नहीं मिल पाई। लेकिन उनके किस्सों और जीवनशैली को पढ़ने वाला हर व्यक्ति उनके व्यक्तित्व की छवि अपने मन में खुद ही बना सकता है।


🕰️ घमंडी चौक आज भी है, लेकिन घमंडी महाराज यादों में हैं

घमंडी महाराज को गुज़रे 60 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन घमंडी चौक आज भी रोज़ लाखों लोगों का रास्ता बनता है। अफ़सोस, इन लाखों में से शायद ही कोई यह जानता है कि इस चौक का नाम किसी “घमंड” के कारण नहीं, बल्कि एक अनोखे, सीधे-सादे और जल्दबाज़ इंसान की वजह से पड़ा था — जो इस शहर की आत्मा बन चुका है।

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