कविता : दूध दही और मोक्ष
दूध से बनता है दही,
उचित समय, उचित मात्रा में,
ज़ामन डालकर जमाने से ।
फट जाता है वही,
नींबू सिरका घोल देने से,
या बेढंग रख-रखाव से ।।
रिश्तों का भी बस हाल है यही,
बनती है बात ,
भावनाओं को संभालने से ।
बिखर जाते हैं वही रिश्ते,
अधिक दिमाग लगाने से ।।
मानते हैं यह तो सभी,
जरूरत है जीवन संवारने की ।
पर जानते नहीं,
जरूरत है उतनी ही,
मौत को संभालने की ।।
जीवन जिए कुछ ऐसा,
रिश्तो को ना लजाएं हम ।
जब अंत समय,
निकल पड़े यात्रा पर,
तो पा जाएं मुक्ति -मोक्ष हम ।
पा जाए मुक्ति- मोक्ष हम ।।
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मंजुला श्रीवास्तव, नई दिल्ली |
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