कविता : दूध दही और मोक्ष

कविता : दूध दही और मोक्ष



दूध से बनता है दही,
उचित समय, उचित मात्रा में, 
ज़ामन डालकर जमाने से ।
फट जाता है वही,
नींबू सिरका घोल देने से,
या बेढंग रख-रखाव से ।।

रिश्तों का भी बस हाल है यही,
बनती है बात ,
भावनाओं को संभालने से ।
बिखर जाते हैं वही रिश्ते,
अधिक दिमाग लगाने से ।।

मानते हैं यह तो सभी,
जरूरत है जीवन संवारने की ।
पर जानते नहीं,
जरूरत है उतनी ही,
मौत को संभालने की ।।

जीवन जिए कुछ ऐसा,
रिश्तो को ना लजाएं हम ।
जब अंत समय,
निकल पड़े यात्रा पर,
तो पा जाएं  मुक्ति -मोक्ष हम ।
पा जाए मुक्ति- मोक्ष हम ।।

मंजुला श्रीवास्तव, नई दिल्ली
📢 अक्षर सत्ता – निर्भीक, निष्पक्ष और गूढ़ विश्लेषण की पत्रकारिता का प्रामाणिक मंच
📞 समाचार, विज्ञापन या कवरेज हेतु संपर्क करें: 9424755191
✍️ संपादक: दयाल चंद यादव (MCJ)
🌐 वेबसाइट: www.aksharsatta.page

Post a Comment

और नया पुराने