"हर फिक्र को धुएं में उड़ाते हुए चला गया एक फोटोग्राफर..." लेखक पंकज स्वामी

"हर फिक्र को धुएं में उड़ाते हुए चला गया एक फोटोग्राफर..."

लेखक: पंकज स्वामी 


जबलपुर की हर धड़कन में बसने वाला कैमरा, आज खामोश हो गया।

सुबह से हो रही मूसलाधार बारिश, मानो शहर की आंखें रो रही थीं। पानी की बूँदों के साथ-साथ जबलपुर की गलियों में एक नाम हर किसी की याद में गूंजता रहा — नितिन पोपट। एक ऐसा छायाकार, जो कैमरे को सिर्फ एक यंत्र नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार मानता था।

जिस कंधे पर जीवन भर कैमरा टंगा रहा, वही कंधा आज अंतिम यात्रा पर चला गया। और यह सोचकर रूह कांप जाती है कि अब वह कैमरा हमेशा के लिए मौन हो गया।


लेखक पंकज स्वामी

जमीनी फोटोग्राफर, जो आसमान की सोच रखता था

नितिन पोपट किसी फैंसी स्टूडियो या भारी-भरकम DSLR से नहीं, बल्कि अपनी सादगी, अपनी नज़रों की सजगता और अपने जज़्बे से तस्वीरों में जान डालते थे। जब शहर की सड़कें पानी से भर जाती थीं, तब वे घुटनों तक पेंट मोड़कर, अपनी मोपेड से निचले इलाकों की तस्वीरें खींचने निकल पड़ते थे।

फोटो केवल फ्रेम नहीं होती थी उनके लिए — वह खबर होती थी, समाज का आईना होती थी। और वह आईना साफ हो, इसके लिए वे अखबार के संपादक से भी दो-दो बातें करने से पीछे नहीं हटते थे।


कभी व्यवसाय नहीं, हमेशा मिशन रहा छायांकन

उन्होंने कभी प्रेस फोटोग्राफी को कमाई का ज़रिया नहीं बनाया। 1960 के दशक से 2017 तक, हर घटना, हर पल, हर चेहरा उनकी कैमरे की नज़रों से गुजरा — और फिर बिना किसी स्वार्थ के वे तस्वीरें अखबारों को सौंप दी जाती थीं। उनके लिए यह सिर्फ काम नहीं था, यह सेवा थी।

उनका मानना था — "कंधे पर कैमरा हर वक्त टंगा रहना चाहिए।" यह उनका मंत्र था, जो उन्होंने अगली पीढ़ी के छायाकारों को सौंपा।


सिगरेट, कॉफी और अंधेरे कमरे का फकीर

नितिन पोपट विल्स सिगरेट के साथ गहरी कॉफी के शौकीन थे। जयंती टॉकीज के सामने उनका ऑफिस और हर्षा प्रिंटर का डॉर्क रूम उनका संसार था। वहां कोई प्रवेश नहीं कर सकता था — क्योंकि वहां वो जादू होता था।

ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी के दौर में, उन्होंने खुद अपने हाथों से फोटो डेवेलप किए। कौन सी फोटो किस अखबार में जाएगी, यह रहस्य उनके मन में ही रहता था। और इस रहस्य में था एक समर्पण — एक तपस्वी का समर्पण।


मोपेड ही थी साथी, कैमरा ही था प्रेम

वे कभी कार में नहीं बैठे, कभी स्टाइलिश बाइक नहीं चलाई। उनकी पुरानी सुवेगा मोपेड और कैमरा ही उनके जीवन के दो पहिये थे। मोपेड उन्होंने बाद में अपने साथी को दे दी, पर कैमरा... वह कभी नहीं उतरा।


शहर की पहचान, एक जीवंत प्रतीक

राजनेता हों या कवि, रंगमंच के कलाकार हों या सामाजिक कार्यकर्ता — जब वे जबलपुर आते थे, तो नितिन पोपट से मिलना ज़रूरी होता था। कवि नीरज से उनके आत्मीय रिश्ते थे। नवभारत में छपी फोटो के नीचे “नितिन पोपट” का नाम देखकर लोग शादी की तस्वीरें खिंचवाने उनके पास चले आते थे।

वे एक ब्रांड नहीं, एक संस्था थे। एक जीवंत पहचान थे।


जो नई पीढ़ी को रच गया चुपचाप

नितिन पोपट ने बसंत मिश्रा, सुगन जाट, पप्पू शर्मा जैसे छायाकारों को सिर्फ सिखाया नहीं, उन्हें वह दृष्ट‍ि दी जो कैमरे से आगे देखती है। सुगन जाट ने जब उनके डॉर्करूम में काम किया, तो हर फोटो में कला की चमक दिखाई देने लगी।


कहानी खत्म नहीं होती...

नितिन पोपट अब नहीं हैं। लेकिन उनकी वो सुवेगा मोपेड, उनकी कॉफी की खुशबू, और कंधे पर टंगा कैमरा — आज भी जबलपुर की हवा में घूमते हैं। और उनका व्हाट्सऐप स्टेटस —
“हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया”
शायद यही था उनका जीवन-सार।

वे वाकई हर फिक्र को धुएं में उड़ाते हुए चले गए। पर हमें बहुत कुछ सिखा कर — सादगी, समर्पण, और सच की छाया में जीने का तरीका।


श्रद्धांजलि नितिन पोपट को — उस कैमरे के ऋषि को, जिसकी साधना जबलपुर की पहचान बन गई।

  • अक्षर सत्ता - तेज तर्रार आपका अख़बार, जनता के हक़ का पहरेदार 
  • अक्षर सत्ता के लिए समाचार, प्रेस विज्ञप्ति, लेख, कविता, कवरेज और विज्ञापन के लिए व्हाट्स अप नंबर 9424755191 पर भेजिए। 
  • संपादक दयाल चंद यादव (एमसीजे)

Post a Comment

और नया पुराने