जबलपुर से आयोजित ऑनलाइन गोष्ठी में साहित्यकारों की भव्य उपस्थिति
जबलपुर, 28 जुलाई 2025। साहित्य की नव्य विधा पूर्णिका आज साहित्यिक मंचों की शोभा बनती जा रही है। इसी क्रम में अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच और आभा साहित्य संघ, जबलपुर के संयुक्त तत्वावधान में मासिक ऑनलाइन पूर्णिका गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन पूर्व परंपरा के अनुसार माह के अंतिम शनिवार को संपन्न हुआ।
कार्यक्रम की गरिमामयी अध्यक्षता रामगोपाल निर्मलकर 'नवीन' (सिवनी, म.प्र.) ने की, जबकि मुख्य अतिथि रहीं श्रेष्ठ पूर्णिका कार रजनी कटारे 'हेम' (जबलपुर)। विशिष्ट अतिथि के रूप में कीरत सिंह यादव 'कीरत' (लहार, भिंड) और सारस्वत अतिथि के रूप में डॉ मुकुल तिवारी 'मुकुल' उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई, जिसे सीमा मिश्र (फतेहपुर, उप्र) ने रसमय स्वर में प्रस्तुत किया। मंच संचालन का दायित्व निभाया पं. अंशुल विश्वंभर मिश्र 'कदम' जबलपुरी ने, जिन्होंने अपनी ओजस्वी शैली से मंच को जीवंत बनाए रखा।
इस गोष्ठी में देश-विदेश से सैकड़ों रचनाकारों ने भाग लिया, जिनमें प्रमुख रूप से डॉ कृष्ण कुमार नेमा 'निर्झर', उमा शर्मा 'अर्तिका', रमेश श्रीवास्तव 'चातक', कविता राय 'कृति', वैशाली वर्मा 'पूर्णिका', डॉ. गीता 'गीत', रेखा नेमा, डॉ. निर्मला डोंगरे 'पूर्णिका', चंद्रलता यादव आदि शामिल रहे।
सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी पूर्णिकाएं मंच पर प्रस्तुत कीं, जिनमें सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएं और जीवन के विविध रंगों की झलक देखने को मिली। उपस्थित श्रोताओं ने इन प्रस्तुतियों की भरपूर सराहना की और पूर्णिका को एक समृद्ध विधा के रूप में स्वीकार करने की बात कही।
कार्यक्रम के अंत में डॉ सलपनाथ यादव 'प्रेम' (पूर्णिका जनक) द्वारा सभी साहित्यकारों को ई-सम्मान पत्र प्रदान कर "पूर्णिका प्रणाम" अर्पित किया गया। गोष्ठी का समापन रश्मि पाण्डेय 'शुभि' (जबलपुर) के आभार प्रदर्शन के साथ हुआ, जिन्होंने कहा — "पूर्णिका अब मात्र एक विधा नहीं, बल्कि एक साहित्यिक आंदोलन बन चुकी है।"
इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि पूर्णिका साहित्य की नई पीढ़ी को दिशा देने वाली विधा बन चुकी है, और इतनी कम अवधि में यह जितनी लोकप्रिय हुई है, वह स्वयं में एक मिसाल है।
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