लेख : फैलते शहर, उजड़ती बस्तियां और सिसकता जीवन
"किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?
महल आबाद है झोपड़ी उजाङ है,
गरीबों की बस्ती में उखाड़ है पछाड़ है।"
बाबा नागार्जुन की कविता आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पहले था। रोजगार की तलाश में शहरों का रुख करने वाली ग्रामीण बेरोजगारों की बड़ी आबादी झुग्गी बस्तियों में अपना ठिकाना बनाती है और अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर है। दिल्ली सरकार ने तो वादा किया था कि जहां झुग्गी-वहां पक्का मकान बनेगा। लेकिन दिल्ली की नई सरकार ने तो बस्तियों का बुलडोज कर राजधानी के झुग्गी वासियों को सङकों पर ले आई है। दिल्ली में 675 से ऊपर झुग्गी बस्तियां हैं। जिन्हें सरकार ने आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है, और ये सभी शहर के लगातार बढ़ते शहरी विस्तार का हिस्सा हैं। ये झुग्गी बस्तियां हालांकि कानूनी तौर पर संरक्षण और पुनर्वास की हकदार हैं, लेकिन बिना किसी उचित विकल्प के इन्हें तेज़ी से ढहाया जा रहा है। दिल्ली सरकार ने मद्रासी कैंप और वजीरपुर के साथ दिल्ली की कई बस्तियों को तोड़ा है। अशोक विहार और वजीरपुर के बीच में बनी जेलरवाला बाग झुग्गियों पर तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई है। इस कार्रवाई में 500 से ज्यादा ज्यादा झुग्गियों पर बुलडोजर चलाया गया है। जून 2025 से अभी तक दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने अपने विभिन्न ध्वस्तीकरण अभियान में 1,500 से अधिक झुग्गियों को बुलडोज करने में सफलता प्राप्त कर ली है। एक आकलन के हिसाब से दिल्ली में तोड़फोड़ अभियान के चलते 27,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। कम से कम 9,000 लोगों को सार्वजनिक आवास नियमों के तहत पुनर्वास से वंचित कर दिया गया है। दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग बुलडोजरों के आतंक से परेशान हैं। लोग इस डर में जी रहे हैं कि कहीं बुलडोजर उनके घरों को ध्वस्त न कर दे और उन्हें शहर से दूर न फेंक दिया जाए। इन झुग्गियों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है जैसे- स्कूल, अस्पताल की कमी।नल हैं, लेकिन पानी नहीं। पानी के लिए जल निगम के टैंकरों पर निर्भर हैं। साफ सफाई की दिक्कतें हैं और कूड़े का ढेर है। लोग इन दिक्कतों में भी रहकर काम के तलाश में अपना राज्य और गांव को छोड़कर यहां रह रहे हैं। लेकिन यह छोटा आशियाना भी बुल्डोजर की भेंट चढ़ गया। जब बस्तियां टूटती हैं तो सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गो पर पङता है। बच्चों पर अपने घर टूटने का मानसिक प्रभाव पङता है, उसके साथ - साथ उनकी शिक्षा पर भी बहुत प्रभाव पड़ता है। झुग्गी बस्ती से विस्थापित परिवारों का कहना है कि चुनाव से पहले सब राजनीतिक पार्टियां कहती हैं कि झुग्गियां नहीं तोड़ी जाएंगी,लेकिन चुनाव के बाद हमें परेशान करते हैं। हमें यहां बिजली नहीं मिलती। हमारे पास बिजली मीटर नहीं है, लेकिन हम जहां भी जाते हैं, हमसे सबूत के तौर पर बिजली का बिल मांगा जाता है। बुलडोजरों के ज़रिए सरकार एक ऐसा शहर बनाना चाहती है जिसमें मेहनतकश गरीबों के लिए कोई जगह नहीं है।किसी भी समाज, देश संस्था और उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की अहमियत किसी से भी कम नहीं आंकी जा सकती। इनके मेहनत के बिना औद्योगिक ढांचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती। शहरी विकास में अनौपचारिक क्षेत्र का महत्व बहुत ज्यादा है। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 500 मिलियन श्रमिकों के भारत के कुल कार्यबल का लगभग 90% अनौपचारिक क्षेत्र में लगा हुआ है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार देश में लगभग 1.23 लाख झुग्गी बस्तियां हैं जिनमें करीब 6.55 करोड़ की जनसंख्या निवास करती है।3 दिसंबर 2005 को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी मिशन (जेएनएनयूआरएम) नाम से एक मिशन शुरू किया गया था। इसी मिशन के अंतर्गत इकॉनोमिक वीकर सेक्शन के तहत आने वाले लोगों के लिए दिल्ली में बनाए गए फ्लैट्स आज भी अपने आवंटन की राह जोह रहे हैं। ये फ्लैट्स झुग्गीवालों के लिए ही बनाए गए थे लेकिन तैयार होने के बाद भी ये किसी को दिए नहीं गए और आज ये खंडहर बने हुए हैं। ऐसे फ्लैट्स की संख्या 35000 से ज्यादा है। कालका जी के भूमिहीन कैंप से क़रीब 60 किमी दूर बवाना और नरेला के इलाक़े में ग़रीबों के लिए मकान बनाने की शुरुआत 2005 में हुई और योजना का नाम रखा गया राजीव रत्न आवास योजना।
शहरी, गरीब बस्तियां मुख्यधारा या केन्द्र माने गए शहरी धनिकों के लिए मानों उपनिवेशी कालोनियां है। जिनके श्रम के बिना शहर चल-फिर नहीं सकता, न ही विकसित हो सकता है। उन्हीं को शहर में जगह नहीं और सुरक्षा भी नहीं। विडम्बना यह है कि शहर के धनिकों को सस्ते मजदूर चाहिए, उनकी कच्ची बस्ती नहीं।मजदूर किसी भी शहर के विकास और कामकाज के लिए बहुत ज़रूरी हैं। वे निर्माण, परिवहन, सफाई, और अन्य आवश्यक सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शहर के विकास के नाम पर अब बिल्डर है। राजनीति पर उन्हीं का दबाव-प्रभाव बना हुआ है। विकास की राजनीति और अर्थनीति में आवास के बुनियादी अधिकारों को कुचलने का प्रयास हो रहा है। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार भारत के दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के शहरों में 65 प्रतिशत जनसंख्या 1 कमरे के घरों में निवास करती है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.2 करोड़ थी। जिसमें से 37.71 करोड़ लोग शहरी क्षेत्र में रहते थे। उसमें से 6.54 करोड़ लोग शहर के झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। 2011 की जनगणना अनुसार देश के शहरी क्षेत्रों में 9,38,348 लोग बेघर थे। वास्तविक संख्या शायद इससे अधिक होगी इस सर्वेक्षण में 607 शहरों को ही शामिल किया गया था। भारत के बङे शहरों की अधिकांश आबादी झुग्गी बस्तियों में रहती है। भारतीय संविधान की धारा - 21 द्वारा जीवन के अधिकार के तहत, बुनियादी मानव अधिकार के रूप में मान्यता दी है। अनेक महत्वपूर्ण अदालती निर्णयों में धारा - 21 के तहत जीवन के अधिकार और उपयुक्त आवास के अधिकार के बीच संबंध को स्पष्टता से स्थापित किया गया है।
बात मध्यप्रदेश की करें तो राजधानी भोपाल को झुग्गी मुक्त बनाने के लिए जिला प्रशासन ने व्यापक अभियान की योजना बनाई है। इस अभियान के लिए पांच वर्ष का लक्ष्य तय किया गया है। पहले साल में करीब 25,000 झुग्गियों को हटाने का प्रयास किया जाएगा।पहले चरण में, कुल 6,534 झुग्गियों को हटाने का लक्ष्य रखा गया है। शहर में कुल 4,50,000 मकानों में से 1,50,000 झुग्गियां हैं, जो शहरी आबादी के एक बड़े हिस्से को आश्रय प्रदान करती हैं।
दूसरी ओर राज्य और केन्द्र सरकार ने लगभग 2 लाख करोड़ रुपए के व्यय के साथ जून 2015 में 100 स्मार्ट शहर बनाने का कार्यक्रम शुरू किया गया था। यह योजना शहरीकरण में सरकार की धारणा को "आर्थिक विकास के एक इंजन" के तौर पर रेखांकित करती है। इस योजना को केंद्र सरकार ने 31 मार्च को बंद कर दिया है। मिशन मात्र 16 शहरों में ही पूरा हो पाया। शेष 84 शहरों में 14 हजार करोड़ कीमत के निर्माण काम जारी थे। 100 स्मार्ट सिटी वाल मिशन में मात्र 45,506 करोड़ रुपए ही अभी तक खर्च हो पाए थे। विश्व शहरीकरण संभावनाओं पर 2014 की संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि तेजी से और अनियोजित शहरीकरण ने वास्तव में "शहरी फैलाव, प्रदूषण के उच्च स्तर और पर्यावरणीय गिरावट के साथ - साथ उत्पादन और खपत के अस्थिर पैटर्न को पैदा किया है।" इसलिए जैसे -जैसे देश शहरीकरण की ओर बढ़ रही है, बेदखली नहीं, बल्कि झुग्गी - झोंपड़ियों का उन्नयन जरुरी है। इसका मतलब है ज़िम्मेदारी से अनौपचारिक बस्तियों की जीवन स्थितियों में सुधार लाना और उन्हें अल्पावधि और दीर्घावधि में अच्छे आवास उपलब्ध कराना। भूमि तक पहुंच और स्वामित्व की सुरक्षा, ऋण तक पहुंच और बुनियादी सेवाओं का प्रावधान एक साथ लाना शहरी नियोजन ढांचे के महत्वपूर्ण घटक हैं।
- राज कुमार सिन्हा
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