सुनो ज्ञानरंजन शब्दांजलि - भारती वत्स

सुनो ज्ञानरंजन  शब्दांजलि - भारती वत्स

सुनो ज्ञानरंजन 
तुम दोस्त बड़े निराले थे 
पिता लिखते समय तुम 
पिता के अंदर घुस कर पिता बने 
और खूब बने 
पगडंडियों में घूमती कहानी को 
उसके सिरे से पकड़ 
मैदान में खड़ा कर दिया
जैसे दो दो हाँथ करने 
और किया भी 
एक तिलस्म जो टूटता ही नहीं 
लिखते चले जाना 
कोई शौक,कोई फ़ैशन तो है नहीं कि 
करते चले जाओ ।

सुनो ज्ञानरंजन











तुम ने दुनियादारी की 
कमअक़्लीयत पर भी लिखा 
लिखने वालों को भी 
खूब साधा
पहल बनकर 
पर दोस्तों के अड्डों के नाम
गुम हो गए तुम्हारे साथ 
तुम किसी के भाई 
किसी के अंकल नहीं बने कभी 
दोस्त रहे 
बड़े गहरे  
दोस्ती को बखानते हुए नहीं
पर दोस्ती को निभाते खूब पाए गए ।

तुम धार दार पैने शब्दों से 
रेंतते रहे बुझदिलों के गले 
डर तुमसे भागता रहा 
डर कर बैठा रहा 
कहीं किसी कोने में 
कल जब अकस्मात् फ़ोन किए बिना 
पहुँच गए तुम्हारे
घोंसलेनुमा घर में तो 
(घोंसला इसलिए कह रही हूँ 
वहाँ गर्माहट थी समेटने की)
एकदम से पैर रुक गए
दिमाग़ बोला अरे बिना बताए कैसे आ गई तुम 
मन बोला 
अब खिसिया के टोकने वाला कहाँ है ?
सच बताऊँ 
मुझे कभी नहीं भाया पूछ कर जाना 
मुझे तो धमकना अच्छा लगता था 
किसी भी दिन कहीं भी 
धमकी भी एक दिन 
एकदम आँखें नहीं मिलाईं तुमसे 
और धड़धड़ा कर सुनयना जी की 
शरण में चली गई 
तुम बुदबुदाते पीछे पीछे ।
ये बताओ ज्ञानरंजन 
कैसे भनक लगती थी तुम्हें 
हमारी परेशानियों की?
जाहिर करने का पाप तुमने कभी नहीं किया 
उनको हल करने में 
चुपचाप शामिल हो गए 

अब जब की कहानी कविताओं की बाढ़ का रेला मचा है 
बड़ी जरूरत है तुम्हारी 
उन्मे से हीरे चुनने को 
कैसे चुन लेते थे तुम 
इतना साफ़ 
क्या होना चाहिए 
क्या नहीं ?
तुमने प्रेम किया 
प्रेम की कविता नहीं लिखी 
पर प्रेम कविता को 
उसकी सही जगह पर रखना 
हमे तुमसे सीखना है ज्ञानरंजन 

ज्ञानरंजन शायद तुम्हें पता हो 
की तुम्हारी उपस्थिति रोक देती थी 
बहुत सारी गुस्ताखियों को 
संग्रहालय के दरवाज़े के बाहर 
ही रुक जातीं थीं 
ये सिर्फ़ तुम्हारे खरे साहस का 
परिणाम था 
बेहूदगियों की औक़ात
हवाओं में तैरती तुम्हारी 
उपस्थिति ही तय कर देती 
तुम एक तीखे पहाड़ थे 
नुकीले कोनेदार 
हर किसी का साहस नहीं था उनको छूने का।
दबी आवाज में 
गूँजती एक छड़ी 
की आवाज़ को हम 
कहाँ ढूँढेंगे 
ज्ञानरंजन?

तुम लथेड़ने में उस्ताद थे ताकतों को 
अपनी खुरदुरी भाषा से भर नहीं 
अपनी पैनी आँखों से भी 
हाँफता- काँपता आदमी 
हिम्मत न कर पाता था उठने की 
तुम्हारा ये साहस रास्ते में साथ चलते 
आदमी में हुक्के की तरह दम भर देता था 

आप सोचेंगे ये आदमी था या बाहुबली 
ये सामान्य क़दकाठी का 
बड़ा पानी सा आदमी था 
किसे थामना है 
किस संतप्त को अपने बाजुओं में भर 
सहलाना है 
इसकी समझ तुम में खूब थी 
ज्ञानरंजन 

तुम कभी बोले नहीं 
तुमने पढ़ा,लिखा हुआ 
और ऐसा पढ़ा कि 
मन के रेशे रेशे जुड़ा जाए 
भींगा हुए अंतःस्थल से 
एक झरना फूट पड़ता 
अकस्मात् और फिर धीरे धीरे 
बहने लगता 
तुम तो पूरे जोशो खरोश से 
तल्लीन रहते 
और हम बहते बहते 
न जाने कब ठिकाने लगते 
दरिया है कि 
बस नावों से भर जाता ।
तुम जानते हो ज्ञानरंजन 
कितनी नावें डूबीं कितनी उतरीं पार?
तुम थे तो वैसे
यारों के यार 
यानि क़िस्सा साढ़े चार यार 
वहाँ काशी भी रोए होंगे 
विश्वनाथ भी 
जरूर 
तुम ऐसे ही थे 
ज्ञानरंजन ।

भारती वत्स





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