‘‘जहाँ हम नहीं होते, वहाँ हमारे शत्रु हमें पहुँचा देते हैं।’’ - लेनिन
जैसे ज्ञान जी को पहुंचाया
आलेख :- मनोहर बिल्लौरे
ज्ञान जी ऐसे ही हैं। अभी अभी ‘‘संगत’’ पर उन से अंजुम शर्मा ने लम्बी बातचीत की, सुनी…। साफ़-शुद्ध, खुली, खरी। अंजुम शर्मा की त्वरा एक मीडिया पत्रकार की तरह लगी। वे नवजवान है और ज्ञान जी…! ज्ञानरंजन के कथाकार, सम्पादक, संगठक, संयोजक व्यक्तित्व में जो खरापन और खारापन है, वह नया नहीं है। उनकी कहानी का ‘मैं’ जिस तरह दृढ़ और सच्चा है - उसकी तस्वीर उनमें उतरती लगती है। अनेक श्रोताओं को बातचीत बहुत सफल लगी यह बातचीत।। इसे और विस्तृत होना था। और भी बहुत से सवाल इस बातचीत से उठते हैं। उनको भी उत्तरों की जिज्ञासा श्रोताओं में है। और कई ऐसे भी हैं कि जल-भुन उठे...। मौक़ा मिला, तत्पर हुए’, रोम-लुचन के लिए। कुछ में अपने देव की प्रसन्नता या इशारे पर अपना ईर्ष्या-विद्वेष-पूर्ण मंतव्य निःसृत होने लगे हैं। कुछ अपनी असहमति में सकारात्मक सोच के साथ विरोधी विचार प्रकट करते हैं। यह सब ‘संगत’ की इस आयोजना की प्रतिक्रियाओं में अभिव्यक्त हुआ।
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| ज्ञानरंजन |
ज्ञानरंजन को व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी कहानियों, उनकी सम्पादन कला, उनका संगठक व्यक्तित्व, के आलवे जो फैल-फुट्ठ लिखा, छपा; तथा उनके पत्र-व्यवहार से गुज़रना होगा। वह भी ऊपरी हल्की पतली सत्ह से नहीं, एक गहरी गहन प्रतिबद्ध वैचारिकता, दृढ़ सैद्धांतिक कठोरता, वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्नता, अनुशासन, समयबद्धता… पर से ग़ुज़रना होगा। ज्ञानरंजन को मिले पत्रों की एक किताब का पहला खण्ड ‘नवारुण प्रकाशन’ से सालेक पहले आया है - ‘‘ख़तों के आइने में ज्ञानरंजन’’ : ‘अकार’ संपादक प्रियवंद जी के कुशल और विशिष्ट सम्पादन में। इसमें कुछ साहित्य शीर्षों के पत्र हैं। इनमें उनके पिता - श्रीरामनाथ सुमन जी के भी पत्र भी हैं - को पढ़ा जाना चाहिए। उनके बचपन के मित्र राजेन्द्र सिंह (रज्जू) ने - जो साहित्कार नहीं - जिनका एकमात्र आलेख प्रकाशित है; परसाई जी, काशीनाथ सिंह, समकालीन शीर्ष आलोचकों के उनके बारे में अभिमत और अन्याय उन्हें निकट से जानने-पहचानने वालों - जिनका साहित्य से नाता नहीं भी रहा है - को धैर्य से पढ़ा, सुना और जाना जाना चाहिए। इससे उनकी सही तस्वीर उभरकर सामने आ पाएगी। और सबसे ख़ास, उनके व्यक्तित्व को कितने लोगों ने गहनता से जाना और समझा है? दूर से तो सांप भी रस्सी की तरह दिखाई दे सकता है।
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| आलेख :- मनोहर बिल्लौरे |
अपनी कहानियों में कथा-वाचक ‘मैं’ अपने पिता, माता, भाई, प्रेमिका, बीवी दोस्त, जानकार…; किसी को नहीं बख़्सता; सबकी बखिया उधेड़ता है। यदि उसे सच्चाई, नेकनीयती, सदाशयता, संजीदापन अथवा सद्भाव नहीं मिलता; इसके बरअक्स चालाकी, चतुराई, शातिरपन, अज्ञानता अथवा कोई सतर्क कलुषता-पूर्ण सघन-चतुराई मिलती है।
इस साक्षात्कार में अंजुम शर्मा ने जैसा कि शुरुआत में कहा कि - ;मैंने जबलपुर में भी रिसर्च की है। पता नहीं वे किस किस से मिले और क्या बात की और जिनसे बातचीत की - वे ज्ञानरंजन के बारे में क्या और कितना जानते समझते और बताते हैं? कितने ही लोग उनसे साक्षात्कर लेने तरस गये। अंजुम के लिए भी वे आसानी से तैयार नहीं हुए होंगे। कुछ लोगों को यह मुग़ालता है कि उनकी वजह से ज्ञान जी इस बातचीत के लिए तैयार हुए। जितना मैंने ज्ञान जी को जाना है उसी आधार पर कह सकता हूँ कि ज्ञान जी को किसी काम के लिए कोई तैयार नहीं कर सकता; जब तक वे ख़ुद तैयार न हों। बहुत सी बातें अंजुम ने ऐसी पूछी जिनका उत्तर वे पहले भी कुछ बार दे या लिख चुके हैं। दुहराने का कष्ट उन्हें जबरन झेलना पड़ा। आत्मप्रचार उनके गुणसूत्रों में नहीं और वह इस गुण को पसंद भी नहीं करते। उन्होंने जो भी प्रमुख काम हाथ में लिया उसे आत्म से आगे और ऊपर रखा। उदाहरण, उद्धरण कई दिये जा सकते हैं…।
किसी के व्यक्तित्व और कृतित्व में दो फांक उन्हें बर्दाश्त नहीं। उनकी कहानियों के पात्रों, लेखों, पत्रों वक्तव्यों, लेखों, साक्षात्कारों में भी हमे बेलाग और बेबाक बयानी के वाक्य यत्र-तत्र बिखरे मिल जायेंगे। यह उनके व्यक्तित्व का भी अनन्य हिस्सा है। इंदौर में एक आयोजन के दौरान उन्होंने उनसे मिलने आये युवा समूह से किसी बात के परिप्रेक्ष्य में कहा था - ‘मैं अपने मित्रों के प्रति बेहद क्रूर हूँ।’ ऐसा उन्होंने कहीं अन्यत्र लिखा भी है। उन पर निकले पत्रिकाओं के विशेषांकों के सम्पादकों को अंक निकालने की अनुमति के लिए ख़ा़सी मशक्कत करनी पड़ी होगी। अनुमति के बाद सम्पादकों को उन्होंने पूरी स्वाधीनता और पूरी छूट दी। आलोचना से उन्हें कोई परहेज नहीं; पत्रिका को अभिनंदन ग्रंथ न बनने दें - कहा होगा…।
व्यक्तित्व और कृतित्व के अलगाव पर ज्ञानरंजन का भरोसा नहीं। वे दोनों को एकमेक मानते रहे, मानते हैं; संगठित भर नहीं संधटित भी। उन्हें यह बर्दाश्त नहीं कि किसी ऐसे व्यक्ति से संबंध रखें जायें चाहे वह कोई भी कितना ही बड़ा और उंचा क्यों न हो - जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व दो फाँक हो। वैचारिक विचलन उन्हें बर्दाश्त नहीं। और इस बात को मूँदने-ढाँकने-थोपने की बजाय बेबाकी औार बेलागी से लिखने या बोलने, कहने में वे चूकते
नहीं।
हमारे अनुभव से ज्ञानरंजन में किसी के भी प्रति ईर्ष्या-द्वेष की भावना नहीं रही। न है। यदि कमतर व्यक्ति ने उनके शीर्ष साहित्यिक विरोधियों (साहित्यिक-शत्रुओं) की दुर्भावना से आलोचना उनके सामने कर दी तो उन्होंने उसे उसी क्षण डपट-भरी फटकार का सामना करना पड़ा है। ऐसा भी नहीं कि वे ज्रिन्हें अपना साहित्यिक शत्रु कह रहे हैं उनसे कपट रखते हैं। वे मुठभेड़ स्वयं भी शुरू नहीं करते। पर जब दूसरा हमला करने लगे तो वे उससे निबटते हैं, पूरी तैयारी के साथ।
राजेन्द्र यादव जी से उनका शुरूआत से ही मतभेद रहा, पर इस सत्य को भी स्वीकार किया कि यादव जी और उनके द्वारा सम्पादित ‘हंस’ की समय समय पर प्रशंसा की है आर उसे साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका माना है। और । इस संबंध में ‘अमरूद की ‘ख़ुशबू’ किताब - जिसे मंगलेश डबराल जी ने सम्पादित किया - में संकलित राजेन्द्र यादव जी पर उनकी टिप्पणी - ‘राजेन्द्र यादव : एक उपलब्ध और मददगार लेखक’ शीर्षक टिप्पणी को पढ़ा जाना चाहिए। इससे राजेन्द्र यादव जी से उनके मूल्यगत संबंधों को जाना जा सकता है।
ज्ञानरंजन का भले ही कोई धुर विरोधी रहा हो उन्होंने किसी से कभी ईर्ष्या नहीं की। कभी द्वैष नही रखा। हाँ, उसे त्यागा ज़रूर। किसी पर पहले हमला नहीं किया। हाँ, ख़ुद पर हुए हमलों के प्रखर और तीक्ष्ण जवाब ज़रूर दिये, जैसा कि इस साक्षात्कार में व्यक्त हुआ। अब देखें - लोग किस तरह मौक़ा पाकर रंग बदलते हैं। आग्नेय को उन्होंने ‘पहल’ का सह सम्पादक बनाया। ख़ुद साहित्य परिषद के पद और ‘साक्षात्कार’ के सम्पादक बनने का मोह छोड़ प्रस्ताव ख़ारिज किया। आग्नेय को अपनी जगह सचिव बनाने में मदद की। और वही आग्नेय बाद में ‘पाखी’ निकले विशेषांक में उन के व्यक्तित्व को धूमिल करने के लिए ज़हर उगलते पाये गये। पर वे उस गरल को भी पी गये। और भी बहुत से उदाहरण और उद्धरण दिये जा सकते हैं, जिनसे यह साबित होता है कि ज्ञानरंजन बड़े रचनाकार ही नहीं, बड़े मनुष्य भी हैं, जो विरलता से मिलते हैं।
और अंत में : - ज्ञान जी ने कहीं लेनिन का एक वाक्य उद्धरित किया है - ‘‘जहाँ हम नहीं होते, वहाँ हमारे शत्रु हमें पहुँचा देते हैं।’’ : लेनिन
- मनोहर बिल्लौरे


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